Showing posts with label बच्चों के लिए स्वास्थ्य सुझावों. Show all posts
Showing posts with label बच्चों के लिए स्वास्थ्य सुझावों. Show all posts

Wednesday, December 26, 2012

नवजातों में पीलिया

जन्म के तुरंत बाद शिशुओं को पहले सप्ताह में सब्से अधिक होने वाली बीमारी  जान्डीस यानी पीलिया होती है । आंकड़ों के मुताबिक़ ,जन्म के कुछ समय बाद ही दो - तिहाई शिशु इस बीमारी की चपेट में  आ जाते है । कुछ बच्चों में तो यह जन्म के 24 के अंदर हो जाती है तो कुछ को 24 से 72 घंटे के अंदर । इस बीमारी में नवजात शिशु की हालत बिगड़ने लगती है । समय पर इलाज न होने पर वह मानसिक और शारीरिक रूप से पीड़ित शिशु का समय पर इलाज न होने पर वह मानसिक और शारीरिक रूप से अपंग हो जाता है । जन्म से एक सप्ताह तक के शिशुओं की देखभाल सावधानी से करने के साथ डाक्टर की भी सलाह लें ।

लक्षण
new born babyपीलिया पीड़ित नवजात शिशु का शुरू पीला पड़ जाता है । जैसे - जैसे बीमारी बढ़ती जाती है शरीर का निचल हिस्सा पीला पड़ने लगता है , मसलन चेहारे के बाद पेट और पैर । अगर शिशु का तलाव पीला दिखने लगे तो समझ लेना चाहिए कि बीमारी गंभीर हो चुकी है । इस बीमारी में शिशु को बुखार भी आ जाता है । बुखार के बाद हाथ - पैर ढीले पड़ जाते है , बाद में कास जाते है । कानिक्टरस की आशंका बढ़ जाती है जिसे 'दिमागी पीलिया ' कहते है । इस दैरान शिशु फीडिंग करना बंद कर देता है । ऐसी स्थिती आने पर शिशु को तुरंत डाक्टर को दिखाना चाहिए ।

रोग के कारण

जन्मजात शिशु की खून की लाइफ्साइकिल वयस्क की तुलना में कम होती है । वयस्क के खून की लाइफ साइकिल 120 दिन होती है , जबकि शिशु की 90 दिन से कम होती है । इसकी वजह से शिशु के शरीर में बिल्रूबिं ज्यादा बन्ने लगता है । शिशु का लिवर कमजोर होने के कारण बिलुरूबिन शरीर से बाहर से बाहर नहीं निकल पाता ,जो जांडिस का रूप ले लेता है । माँ का ब्लड ग्रूप आरएच निगेटिव भी शिशु में जांडिस का कारण बनता है । शिशु में एंजाइम की कमी और संक्रमण के कारण भी जांडिस हो सकता है ।

जान्डीस का सबसे कारगर इलाज फोटोथैरेपी यानी सिकाई है । इसमें शिशु को आवश्यकतानुसार रखकर इलाज किया जाता है । फोटोथैरेपी से निकलने वाली किरणे शिशु के शरीर में क्रिया कर बिलरूबिन को पेशाब में बदल देती है जो पेशाब के जरिये बाहर निकल जाता है । इसके अलावा , जंभीर रूप से बीमार शिशुओं को दवाएं भी दी जाती है ।

जांडिस में धूप नुकसानदायक

शिशुओं में जांडिस होने के बारे में लोगों की धारणा है कि धूप से बीमारी ठीक हो जाती है ,लेकिन ऐसा नहीं है । सूर्य की किरणों में अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड किरणों होती है , जो बच्चे को नुक्सान पहुंचाती है । बच्चे को ज्यादा समय तक धूप में रखने से बच्चे को हाइपरथर्मीया का शिकार हो सकता है ।

  • शिशु को जन्म के 7 दिनों तक डाक्टर की निगरानी में रखे ।

  • अगर जन्म के 24 घंटें के अंदर जांडिस होता है , तो माँ का ब्लड ग्रूप या एंजायिम की जांच कराएं ।

  • अगर माँ का ब्लड ग्रूप निगेटिव है , तो इसका इलाज करायें । कुछ दवाएं माँ को खानी पड़ सकती है ।

  • संक्रमण से बचाव के लिए माँ शिशु को सही तरीके से स्तनपान करायें ।

  • संक्रमण से बचाएं और शिशु को सामान्य तापमान में रखे ।

Monday, October 22, 2012

नवजात शिशु का देखभाल

नवजात शिशुओं में लगभग 90 प्रतिशत की मृत्यु ऐसे कारणों से होती है, जिनसे बच्चे को बचाया जा सकता है।

जन्म के समय वज़न कम होना।
समय पूर्व जन्म।
जन्म के समय बच्चे का सांस न लेना।
संक्रमण, पीलिया।

नवजात शिशु की देखभाल का सबसे महत्वपूर्ण समय मां के गर्भ के दौरान होता है। गर्भ के दौरान यदि मां स्वस्थ है, उसका खानपान उचित हो और गर्भ से संबंधित कोई विकार न हो तो बच्चा जन्म के समय स्वस्थ रहता है। चीनी लोगों का मानना है कि जन्म के समय बच्चे की उम्र 9 महीने की होती है, जबकि हम जन्मदिन बच्चे के पैदा होने के वक्त मनाते हैं। 

इसका मतलब यह है कि कंसेप्शन के पहले दिन से ही बच्चे का जीवन शुरू हो जाता है और तभी से उसका पूरा-पूरा ध्यान रखने की जरूरत होती है। इस दौरान की गई देखभाल से ही शिशु जन्म के समय स्वस्थ होगा। इसी तरह इस दौरान बरती गई लापरवाही का नतीजा भी जन्म के समय पेश आने वाली जटिलताओं के रूप में सामने आता है।

नवजात शिशु की देखभाल के लिए मां को समुचित जानकारी मेडिकल व पेरामेडिकल स्टाफ द्वारा दी जानी चाहिए। जहां तक संभव हो सके, प्रसव हमेशा अच्छे अस्पताल में ही होना चाहिए, ताकि चिकित्सक और नर्स की सेवाएं मिल सकें। इससे जटिलताओं की आशंका कम हो जाती है। किसी भी प्रकार की जटिलता पेश आने पर हॉस्पिटल में तुरंत उससे निपटने की व्यवस्था की जा सकती है। 

जन्म के आधे घंटे के अंदर बच्चे को मां का दूध मिलना चाहिए। जीवन के पहले 6 महीनों तक बच्चे के लिए मां का दूध ही संपूर्ण आहार है। इस दौरान मां के दूध के अलावा कोई भी चीज न दें। कई लोग बच्चे को पानी, घुट्टी, शहद, नारियल पानी, चाय या गंगा जल पिलाने की गलती करते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए। 

शुरुआती 6 महीनों तक माता का दूध पीने वाले बच्चे अच्छी तरह विकसित होते हैं। संक्रमण से उनका बचाव होता है। साथ ही उनमें अपने माता-पिता के प्रति भावनात्मक लगाव लंबे समय तक बना रहता है। 6 महीने की उम्र के बाद बच्चे को माता के दूध के अलावा ऊपरी आहार भी देना चाहिए।

जन्म के तुरंत बाद शिशु को पोलियो की दवा, बीसीजी और हिपेटाइटिस का टीका देना चाहिए। शिशु को ठंड से बचाने के लिए उसे पूरे कपड़े पहनाने चाहिए। कपड़ों के साथ ही उसे टोपी, ग्लवज और मोजे पहनाकर रखना चाहिए। बच्चे को मां के समीप रखना चाहिए, क्योंकि मां के शरीर से बच्चे को गर्मी मिलती है। 

स्वच्छता...
मां को स्वच्छता का पूरा ख्याल रखना चाहिए ताकि बच्चा गंदगी व संक्रमण की चपेट में न आ सके। गद्दे और चादर साफ होने चाहिए। मां और बच्चे दोनों के कपड़े साफ धुले हुए होने चाहिए। बच्चे और मां को रोज नहाना चाहिए। मां के नाखूनों में मैल जमा नहीं होना चाहिए।

मालिश... 
बच्चे की मालिश करना फायदेमंद होता है, यह वैज्ञानिक रूप सही माना जाता है। मालिश हल्के हाथ से करना चाहिए। मालिश दोपहर के समय करना चाहिए, ताकि बच्चे को ठंड न लगे।क्या पहनाएं... 
गर्मी का मौसम हो तो नवजात को कॉटन के ढीले कपड़े पहनाने चाहिए। बच्चे का शरीर पूरी तरह ढंका होना चाहिए, ताकि उसे ठंड न लग पाए और मच्छरों से बचाव हो सके। गर्मी में बच्चे को ऊनी कपड़े पहनाने की आवश्यकता नहीं होती है। मौसम में ठंडक होने पर ही ऊनी कपड़े पहनाएं। ठंड के मौसम में ऊनी कपड़े पहनाएं, लेकिन अंदर पतला, नर्म कॉटन कपड़ा जरूर पहनाएं। भ्रांति और तथ्य... 
भ्रांति : बच्चों की आंखों में काजल लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि काजल लगाने से बच्चों की आंखें बड़ी होती हैं। तथ्य : बच्चों को आंखों में काजल नहीं लगाना चाहिए यह नुकसानदायक होता है।



Wednesday, October 17, 2012

सबसे अच्छा करने के लिए अपने बच्चे को खिलाने के तरीके

शिशु को स्तनपान करना एक स्वाभाविक - सी प्रक्रिया है , लेकिन फिर भी  माएं इसे सही तरीके से नहीं करा पाती । अक्सर आपने बहुत सी माओं को देखा होगा कि जब वे अपने शिशु को स्तनपान करती है तो यह भूल जाती है कि वह बच्चे को सही तरीके से स्तनपान करवा रही है या नहीं । डाक्टरों का मानना है कि स्तनपान करने का अपना भी एक तरीका होता है । इस हुनर को सीखना ही पड़ता है । कई बार कुछ , शारीरक तकलीफों की वजह से यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती , क्योंकि दोनों ओर से तजुर्बे की कमी होती है । मां को दूध पिलाना नहीं आता और शिशु को दूध पीना नहीं आता । सही मुद्रा में बैठने व् बच्चे को सही तरीके से पकड़ने पर स्तनों में दूध भी अपने - आप उतर आता है लेकिन आपको यह पता होना चाहिए कि स्तन का निप्पल शिशु के मुह में कैसे दिया जाए । आइए  जाने स्तनपान कराने का सही तरीका क्या है ।

feedingकैसे कराएं स्तनपान :

  •  स्तनपान कराने के लिए कोइ शांत सी जगह चुनें । शांत जगह पर आपको भी आराम मिलेगा और शिशु भी आराम से अपना पेट भर सकेगा ।

  • अपने पास कोई किताब रख ले , लेकिन स्तनपान के दौरान किताब पढ़ते समय बीच - बीच में शिशु पर भी नजर डालें ।

  • शिशु को आरामदायक तरीके से उठने के लिए गोद में तकिया रख ले बिना सहारे न उठाने से बाजुओं में एंठन या दर्द हो सकता है । यदी हो सके तो टाँगे bhee ऊंची रखें ।

  • शिशु का मुह अपने निप्पल की ओर करके लिटाएं । उसका पूरा शरीर आपकी ओर होना चाहिए ।सही  पोजीशन होने से आप भी स्तनपान से जुडी कई तकलीफों से बच जाएँगी ।

  • पहले कुछ सप्ताहों में स्तनपान की दो पोजीशन उचित बताई जाती है । पहली है - 'क्रासओवर होल्ड '
    एक हाथ से शिशु के सिर को सहारा दे व दूसरे हाथ से उसका पूरा शरीर संभाले । फिर पूरा शरीर संभालने के बाद उसी हाथ से अपना निप्पल उसके मुह में डालें । स्तन को हलके से दबाएँ ताकि उसके भार से शिशु का नाक न दबे ।

  • दूसरी पोजीशन 'फुटबाल होल्ड ' कहलाती है । इसे 'क्लच होल्ड ' भी कहते है । सी - सैक्शन के बाद यह काफी फायेमंद होती है , क्योंकी इससे पेट पर फालतू दबाव नहीं पड़ता । अगर आपकी चेस्ट बड़ी है या शिशु प्रीमेचोर है या आप जुडवा को दूध पिला रही है तो शिशु को अधलेटी मुद्रा में लिताएं । उसके हाथ - पैर आपकी बाजू के नीचे हों । एक हाथ से स्तन संभाले । जब आपको अच्छी तरह स्तनपान करना आ जाएगा ।

  • निप्पल को शिशु के नाक के पास से निचले होंठ तक ले जाएं ताकि वह चौड़ा मुह खोल सके । इस तरह स्तनपान के दैरान उसका निचला होंठ नहीं दबेगा । यदि वह अपना सिर घुमा ले तो उसे प्यार से वापस लौटा लाएं ।

  • जब शिशु मुंह खोल ले तो स्तन को आगे की ओर लाने की बजाए उसके मुह को स्तन के पास लाएं । जब माँ स्तन को जबरन शिशु के मुह में देती है तो कई तरह की परेशानियां हो सकती है । अपनी पीठ सीधी रखते हुए शिशु को स्तन के पास लाएं ।

  • शिशु को निप्पल अपने मुंह में लेने से दूध नहीं निकलेगा । उसके आसपास का कुछ हिस्सा भी शिशु के मुह में जाना चाहिए क्योंकि वही दूध ग्रंधियाँ है जिन्हें दबाने से दूध निकलता है । कई शिशु तो भूखे  होने पर स्तन का कोई भी हिस्सा चूसने लगते है , चाहे दूध न निकले । इससे स्तन पर चोट पहुँच सकती है ।

  • यदी स्तन से शिशु का नाक दबे तो स्तन को अंगुली से दबाएँ , शिशु को थोड़ा ऊंच उठा कर सांस लेने दें लेकिन इस प्रक्रिया में एरिओना से उसकी पकड़ ढील न  पड़ने दें ।

  • दिन में कम से कम 8 से 12 बार दूध पिलाएं । दूध भी पूरा बनेगा । शिशु भी प्रासन्न रहेगा । अगर चार घंटे बाद दूध पिलाएंगी तो दूध भी नहीं बन पाएगा और स्तनों में रक्त्संकुलता हो जाएगी । शिशु को सही पोजीशन में दूध पिलाएं ताकि निप्पलों में सूजन या दर्द न हो । यदि पोजीशन सही हो तो आप कितनी भी देर आराम से दूध पिला सकती है ।

  • शिशु को दोनों स्तनों से दूध पिलाएं । एक स्तन खाली होने के बाद दूसरा स्तन मुंह से लगाएं । इस तरह उसकी भूख भी शांत होगी और पूरा पोषण भी मिलेगा । उसे  स्तन से पूरा पोषण भी मिलेगा ।उसे एक ही स्तन से पूरा दूध पीने दें । यदि वह चाहे तो उसे दूसरा स्तन दें लेकिन जबरदस्ती न करें । याद रखें कि आपने अगली बार भरे हुए स्तन से दूध पिलाना है । यही क्रम बनाए रखें ।

  • अगर शिशु का मुंह फूल रहा है तो पता चल जाएगा कि उसके मुंह में दूध की पूरी धार जा रही है  ।

  • यदि वह दूध पीना पसंद करने के बाद भी स्तन न छोड़े तो अचानक खींचने से निप्पल में दर्द हो सकता है । शिशु के मुंह के एक कोने में अंगुली डाल कइर थोड़ी हवा निकलने दें , फिर धीरे से निप्पल बाहर निकालें ।

  • बर्थिग रूम में ही इसकी शुरूआत करें । अगर शिशु व आपको पहले - पहल स्तनपान का मौका न मिले तो निराश न हों । इसका मतलब यह नहीं कि आप इसकी शुरूआत नहीं कर पाएंगी । आप दोनों  को ही इस बारे में काफी कुछ सीखना है ।

  • शिशु के भूख लगने पर स्वयं को तैयार रखें । कही एसा न हो कि वह भूख से रोए और आपकी आंखों नींद से बोझिल हो रही हों ।

  • जितना हो सके दूसरों की मदद लें । यदि यह सुविधा न हो तो अनुभवी नर्स या डाक्टर से मदद लें । वे आपको उपयोगी टिप्स दे सकते है ।

  • शुभ्चिंताकों की भीड़ से बचे । मुलाकाती आपकी व शिशू की इस प्रक्रिया में बाधा दे सकते है ,आपको एक आरामदायक माहौल बनाना है । पूरी एकाग्रता के साथ शिशु को स्तनपान करना है ताकि दिनों ओर से भरपूर संतुष्टि मिल सके ।

  • यदी शिशु की शुरुआत धीमी हो तो निराश न हो । हो सकता है कि उसे भी डिलीवरी की थकान हो । नवजात शुशु को नींद भी बहुत आती है । उनके पास पहले से कुछ दिन का पोषण होता है इसलिए खुलकर भूख लगने पर उनके पास पर्याप्त मात्रा में दूध पीने की की ताकत भी आ जाएगी ।

  • शिशु को बोतल के दूध से बचाएं । कही ऐसा न हो कि वह स्तनपान करने से पहले फार्मूला दूध से ही अपना पेट भर ले , बोतल के दूध से उसकी भूख भी शांत नहीं होगी और उसे उपयोगी कोलोस्टम भी रही है तो उसे स्तनपान के आसपास न दें , उसे बोतल का चस्का पद गया तो मुश्किल होगी क्योंकि उससे दूध पीने में कम मेहनत लगती है । हो सकता है कि स्तनपान में उसकी रूचि ही खत्म हो जाए ।


 

शिशु मालिश युक्तियाँ

शिशू की मालिश 'बेबी स्किन केयर ' का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । यह केवल शरीर को ही लाभ नहीं पहुंचता वरन स्वस्त मानसिक विकास के लिए भी बहुत जरूरी है । यह बच्चे और माँ के बीच भावनात्मक जुड़ाव तथा बच्चे को सुरक्षा का एहसास करता है ।

कैलाश हास्पिटल और डार्ट इंस्टीटयूट की वरिष्ठ चाइल्ड स्पेशलिस्ट डाँ. रूचिरा गुप्ता कहती है कि बच्चे के विकास के लिए मसाज बहुत जरूरी है । यह बात कुछ समय पूर्व एक अंतराष्ट्रीय सर्वेक्षण से भी सामने आई है । इसमें शिशुओं की मालिश की गयी और दूसरे ग्रुप में नहीं । नतीजा यह रहा कि मालिश किए गए बच्चों का विकास अच्छा रहा । इसके अलवा मसाज से त्वचा नर्म व् लचीली हुई ।साथ ही रक्त संचालन में मदद तथा मांसपेशियों में टोनिंग के साथ शिशु का बेहतर विकास हुआ ।

मसाज कब शुरू व कितनी बार करें   

डाँ . रुचिरा गुप्ता कहती है कि लगभग दस से पंद्रह दिन में बच्चे की मालिश शुरू कर देनी चाहिए । इसका एक कारण यह है कि बच्चे का शुरू में सात दिनों में स्वत : ही वजन कम हो जाता है और फिर बढना शुरू होता है । डाँ . गुप्ता के अनुसार बच्चे को मसाज एक नियत समय पर दिन में एक बार ही करनी चाहिए । कई माएं दिन में कई बार मसाज करती है , जो उचित नहीं है ।

मसाज के लिए आँयल का चुनाव 

कोकोनट आँयल से बेबी मसाज ठीक रहती है । पर कुछ बच्चों को सूट नहीं करता । अत : मसाज के लिए मस्टर्ड आँयल , कोकोनट आयल , आलमंड आँयल और आलिव आँयल में से जो आँयल बच्चे  की त्वचा को सूट कर जाए उससे मालिश करनी चाहिए । देसी घी और मलाई का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।

मालिश कब और कितनी देर करें  :  बच्चे को मालिश दूध पिलाने के एक घंटें बाद करनी चाहिए । पंद्रह मिनट से लेकर आधे घंटे तक मालिश की जा सकती है । मालिश के एक घंटे बाद नहलाना चाहिए ।

मालिश की प्रक्रिया : babymassage

  • एक बड़े पर एक पानी निरोधी शीत बिछाएं और उसके ऊपर मलमल के कपड़े की चार तह करके बिछा दे ।

  • मालिश के लिए रूम टेम्परेचर 28 से 30 डिग्री रखे क्योंकी बच्चा उस समय कुछ पहने नहीं होता ।

  • मालिश से पहले बच्चे के हाथ से कडा आदि उतार दे । अपने नाख़ून काट लें और मसाज का तेल ज्यादा मात्र में प्रयोग में लाएं ताकि रूखेपन की रगड़ से बेबी की त्वचा को खतरा न पहूंचे ।

  • मालिश सर्कुलर मोशन में हलके हाथों से करनी चाहिए व सिर से शुरू करके नीचे की तरफ आना है

  • पैरों पर मालिश करते समय तलवों से शुरू करके जघाओं की तरफ आएं ।

  • जननांगों की मालिश सबसे बाद में करे ।

  • कानों की बाहर सफाई तो ठीक है पर कानों के अंदर बड्स न डालें । तेल भी न डालें ।


BabyMassageTechniquesशिशु को थोड़ी एक्सरसाइज भी कराएं  :

  • शिशु के दोनों हाथों को धीरे से ऊपर सिर की और हल्का सा खीचे ।

  • दोनों पैरों की नीचे की ओर थोड़ा खीचे ।

  • दोनों पैर और बाएं हाथ को अपने एक हाथ से पकड़कर पहले बीच में छाती पर लाएं ,फिर वापस विपरीत दिशा में खीचे ।

  • इसी प्रकार बाएं पैर और दायें हाथ की भी एक्सरसैज करवाएं ।

  • सर्दी के मोसम में बच्चें को थोड़ी देर धूप में लिताएं ।

  • मौसैम के अनुसार गरम पानी से बच्चे वाले साबुन से शरीर को साफ करें |

Monday, October 15, 2012

बच्चों और उनके उपचार के लिए स्वास्थ्य समस्याएं

दांत निकलने में परेशानी होना  :   बच्चे के 6 महीने के होते - होते उसके दांत निकलने शुरू हो जाते है ।हर समय माँ के लिए काफी परेशानी से भरा होता है  क्योकी शिशु के दांत निकलते समय वह चिडचिडा हो जाता है , उसके मसूडोम में खुजली रहती है , इससे वह बेचैन रहता है ।कभी कभार बच्चे को उल्टी व दस्त भी लग जाते है । लेकिन एसा होने पर परेशान होने  की जरूरत नहीं है । यह बहुत ही साधारण प्रक्रिया है जोकी लगभग हर शिशु के साथ होता है ।

क्या करें  : 

  • आजकल बाजार में कई तरह की टीयिंग रिंग भी आती है । वह आप बच्चे को दे सकती है , लेकिन ध्यान  दे की इसमें कई लिक्विड नहीं होंना चाहिए वह चीज इतनी छोटी भी नहीं होनी चाहिए कि बच्चा निगल लें ।

  • डाक्टर से बात करके बच्चे को कोई दवा भी दे सकती है ।


जान्डीस यानी पीलिया :  जन्म के 3 - 4 दिन के बाद उसे पीलिया की बीमारी हो सकती है ।इसमें बच्चे का रंग व् आंखों पीली पड़ जाती है । इसके ठीक होने में कुछ समय लगता है ।

baby

क्या करें  : यह किसी भे बच्चे को हो सकती है इसलिए डरे नहीं कि यह बीमारी आपके बच्चे को क्यों हुई है । लेकिन समय रहते उसकी डाक्टर के पास जांच जरूर करवाएं । अश्रुनलिकाओं का ब्लाक होना   :  जन्म के समय बच्चे की एक या दोनों अश्रुनलिकाएं ब्लैक हो और आंखों के किनारे पर स्टिकी म्यूकस हो तो यह समस्या आती है ।

क्या करें  :    यह नलिका आमतौर पर जन्म के दो हफ्तों के बाद खुलती है इसलिए घबराएं नहीं ।

बच्चे का नहीं रोना  :  नार्मल डेलिवरी के बाद बच्चा पैदा होते ही तेजी के साथ रोता है । अगर नहीं रोता तो माता - पिता चिंतत हो जाते है ।

क्या करे   :   अगर शिशु किसी शाक की वजह से नहीं रोया तो एकदम से टेंशन ना ले क्योंकी ऐसे में डाक्टर बच्चे को उसकी पीठ थपथपा कर रुला देते है ।

आइबाल मूवमेंट   : अगर आपका बच्चा अपनी आँखे कुछ दिन नहीं खोलता तो परेशान न हो क्योंकि यह साधारण बात है  । इसका कारण है कि नवजात शिशु के आंखों की पुतली ठीक ढंग से विक्सित नहीं होती है इसलिए वह आंखों को कुछ दिन बंद ही रखता है । इसके बाद आप खुद भी अपने बच्चे की आंखों की जांच कर सकती है ।

क्या करें  :   जब भी बच्चा आंखों खोले तो आप तुरंत ही अपनी उंगली के माध्यम से उसका ध्यान चलती हुई उंगली की ओर खीचे । अगर बच्चे की पुतलियां दायें - बायें ठीक ढंग से धूम रही हो , तो बच्चे की आँखें ठीक है अगर वह पुतलियाँ नहीं घुमा रहा तो उसका कारण कुछ ओर भी हो सकता है इसलिए डाक्टर से संपर्क करें ।

गैस से संबंधित समस्या हो तो  :  जन्म के बाद बच्चे का पाचन तंत्र पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ होता है इसलिए दूध पीने के बाद वह उसे उलट देता है ।

क्या करे  :  जबी भी बच्चे को दूध पिलाएं तो उसकी पीठ पर हलके से 1 - 2 मिनट के लिए थपकी मारे जिससे उसे डकार आ जाए । यह डकार बच्चे के पेट में जैस बनने से रोकेगी । साथ ही अगर बच्चे के पेट में गैस हे तो उसे निकालने के लिए उसे पीठ के बल लिटाएं और उसके दोनों पैरों को साइकिल चलाने वाले अंदाज में घुमाएं , इससे पाचन तंत्र मजबूत होगा और गैस भी निकलेगी ।

Sunday, October 14, 2012

बच्चों की बीमारियों से ना घबराएं

बच्चे की किलकारियों से सूने घर में रौनक आ जाती है । उसकी शरारते देख कर माता - पिता का तनमन प्रफुल्लित हो उठता है । लेकिन नवजात शिशु को संभालना उतना आसन भी नहीं है क्योंकी छोटे बच्चे का अधिक ख्याल रखना पड़ता है । बच्चे को कैसे नहालाए ? बच्चे को कैसे दूध पिलाए ? वह रो क्यों रहा है ? उसे बुखार आ गया तो क्या करे ? आदि कुछ ऐसे सवाल है , जिनके लिए माता - पिता परेशान होते रहते है लेकिन यह उतना मुश्किल भी नहीं है । बस थोड़ी सी जानकारी और समझदारी की जरूरत होती है , आइए जानें की जब आपकी जिंदगी में नन्हा - मुन्ना आ जाए तो उसका ख्याल कैसे रखे -

रैशेज होना  :  बच्चे की पैटी समय - समय पर और दायपर बदलने पर भी जब मां देखती है कि बच्चे के रैशोज हो गए है या फिर त्वचा लाल होकर छाले पड़ गए है तो वह घबरा जाती है और तुरंत डाक्टर से संपर्क करती है लेकिन इन छोटी - छोटी सी बातों के लिए डाक्टर के पास जाने की कोई जरूरत नहीं है ।

baby-cryingक्या करें  : इस बात का ख़ास खायल रखे कि बच्चे को गीला ना रखे । एक दिन में कम से कम बच्चे कि 12 से 14 बार नैपी बदलनी पड़ती है ।

  • नैपी बदलने का सारा सामान एक जगह पर पहले ही रखे ले ताकी बच्चे को अकेला छोड़कर जाना ना पड़े ।

  • बच्चे को वाटरप्रूफ पैटी ना पहनाएं क्योंकी उसमे नमी रह जाती है जो बच्चे की नाजूक त्वचा के लिए ठीक नहीं रहती है ।

  • यह सब करने पर भी अगर 3 से 4 दिन में रैशेज ठीक ना हो तो डाक्टर से संपर्क करें ।

  • उसे डायपर पहनने के बदले हो सके तो काटन के कपडे से तैयार नैपी पहनाएं ।


बच्चा रोए तो डरे नहीं  :  बच्चे के बड़े होने के साथ ही उसमें बहुत से बदलाव होते है । जन्म के कुछ महीनों बाद तक शिशु सिर्फ रोकर ही अपनी बात कहता है । यही उसके कम्यू निकेशन का तरीका होता है इसलिए बच्चे की भाषा को समझने की कोशश करें ।

क्या करें : 



  • बच्चा कई बार भूखा होता है , इस वजह से रोता है इसलिए उसके दूध पीने के समय का ख्याल रखे ।

  • अगर बच्चे की पैटी गीली हो तो उसे असहज लगता है और वह जोर - जोर से रोता है ।

  • बच्चे की स्किन बहुत संवेदनशील होती है उन्हें बहुत ही जल्दी गर्मी और ठंडे लगने लगती है इसीलिए उनके कपड़ों का ध्यान रखें ।

  • अगर बीमार है तो भी वह रोता है । बच्चे का तापमान देखें और उसे डाक्टर के पास ले जाए ।

  • अगर बच्चे को नींद आ रही हो और वह नहीं सो पा रहा हो तो भी वह रोता है इसीलिए बच्चे को शांत कमरे में ले जाकर सुलाएं ।


शिशु का वजन कम हो तो डरे नहीं   :  अगर जन्म लेने के 48 घंटों के भीतर शिशु का वजन 5 से 7 प्रतिशत तक कम हो जाए तो भी माता - पिता घबरा जाते है । लेकिन यह नार्मल है और इसके कई कारण भी है । लेकिन अगर बच्चे का वजन 10 प्रतिशत से अधिक कम हो रहा है तो डाक्टर से संपर्क करें ।

क्या करें  : 



  • प्रेगनेंसी में हार्मान चेंज की वहज से शरीर में पानी बढ़ जाता है .लेकिन जब बच्चा पैदा होता है तो यह  पानी निकल जाता है

  • नवजात शिशु में पैदा  शिशु में पैदा होने के बाद भी वसा स्टोर रहती है । इस वसा को वह तीन दिन तक इस्तेमाल कर सकता है क्यों की पहले दिन माँ के दूध में वसा व् न्यूट्रीशियन्स नहीं पाए जाते है , इसीलिए बच्चा तीन दिन तक अपने भीतर एकत्र की हुई वसा का प्रयोग करता है , इससे उसका वजन कम हो जाता है ।

  • अगर बच्चे का वजन ज्यादा ही कम हो रहा है तो इसका कारण यह भी हो सकता है कि अकसर बच्चे दूध पीते वक्त बहुत सारी हवा अपने अंदर ले लेते है , जिससे उनका पेट फूल तो जाता है लेकिन भर नहीं पाता है । इसका मतलब है कि आपको बच्चे को सही ढंग से दूध पिलाना नहीं आ रहा इसलिए अपने डाक्टर से बातचीत करें और दूध पिलाने की सही विधि पूछे ।