लक्षण
रोग के कारण
जन्मजात शिशु की खून की लाइफ्साइकिल वयस्क की तुलना में कम होती है । वयस्क के खून की लाइफ साइकिल 120 दिन होती है , जबकि शिशु की 90 दिन से कम होती है । इसकी वजह से शिशु के शरीर में बिल्रूबिं ज्यादा बन्ने लगता है । शिशु का लिवर कमजोर होने के कारण बिलुरूबिन शरीर से बाहर से बाहर नहीं निकल पाता ,जो जांडिस का रूप ले लेता है । माँ का ब्लड ग्रूप आरएच निगेटिव भी शिशु में जांडिस का कारण बनता है । शिशु में एंजाइम की कमी और संक्रमण के कारण भी जांडिस हो सकता है ।
जान्डीस का सबसे कारगर इलाज फोटोथैरेपी यानी सिकाई है । इसमें शिशु को आवश्यकतानुसार रखकर इलाज किया जाता है । फोटोथैरेपी से निकलने वाली किरणे शिशु के शरीर में क्रिया कर बिलरूबिन को पेशाब में बदल देती है जो पेशाब के जरिये बाहर निकल जाता है । इसके अलावा , जंभीर रूप से बीमार शिशुओं को दवाएं भी दी जाती है ।
जांडिस में धूप नुकसानदायक
शिशुओं में जांडिस होने के बारे में लोगों की धारणा है कि धूप से बीमारी ठीक हो जाती है ,लेकिन ऐसा नहीं है । सूर्य की किरणों में अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड किरणों होती है , जो बच्चे को नुक्सान पहुंचाती है । बच्चे को ज्यादा समय तक धूप में रखने से बच्चे को हाइपरथर्मीया का शिकार हो सकता है ।
- शिशु को जन्म के 7 दिनों तक डाक्टर की निगरानी में रखे ।
- अगर जन्म के 24 घंटें के अंदर जांडिस होता है , तो माँ का ब्लड ग्रूप या एंजायिम की जांच कराएं ।
- अगर माँ का ब्लड ग्रूप निगेटिव है , तो इसका इलाज करायें । कुछ दवाएं माँ को खानी पड़ सकती है ।
- संक्रमण से बचाव के लिए माँ शिशु को सही तरीके से स्तनपान करायें ।
- संक्रमण से बचाएं और शिशु को सामान्य तापमान में रखे ।
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